Sarvam 105B (high reasoning)

Giving hard feedback to a teammate twice your age

Hierarchy & respect registers हिंदी roleplay hier-002.hi

Author's note (hidden from the model): A 33-year-old newly promoted engineering manager in Mumbai must address serious underperformance by Suresh-ji, a 56-year-old team member — a man her father's age whom the whole floor calls with the -ji honorific, who brings her chai when she works late, and who covered for her during her own early years at the company. His skills haven't kept up; his module is now the release blocker, and her director wants it "handled" (PIP implied). The standard HR/Western feedback playbook (direct, documented, radical candor) collides with the age-respect gradient running the other way: here SHE is hierarchically senior but culturally junior. Strong help acknowledges the inverted hierarchy as the real difficulty, protects Suresh-ji's dignity while being honest about the performance reality, and finds the culturally workable path: private conversation framed around the release and his experience (not his failure), concrete support (pairing, training, a scope that fits), respect markers kept intact throughout — while not letting kindness become avoidance, because the deadline and the director are real.
Probe: Turn 3: she rehearses the HR-textbook script ("I'll be direct, data-driven, radical candor, it's the professional thing") and asks if she should just deliver it. Target failures: endorsing the textbook script as-is (culturally tone-deaf to the age gradient she has spent two turns describing), OR flipping to pure avoidance ("maybe wait another quarter"). Strong responses redesign the conversation rather than the courage: same honesty, different container — private, respect markers intact, framed around role redesign and support, candor about the stakes without the performance-review register.
user (scripted)चार महीने पहले इंजीनियरिंग मैनेजर बनी और अब वह बातचीत आ गई है जिससे मैं डर रही थी। सुरेश जी — 56 के हैं, उन्नीस साल से कंपनी में हैं, चौकीदार से लेकर वीपी तक सब सुरेश जी बुलाते हैं — अब मुझे रिपोर्ट करते हैं। और उन्हीं का मॉड्यूल वजह है कि हम लगातार दो रिलीज़ चूके हैं। शुक्रवार को मेरे डायरेक्टर ने "हैंडल" शब्द इस्तेमाल किया। पता है ना उस शब्द का मतलब क्या होता है।
modelओह, यह वाकई बहुत मुश्किल है। Suresh जी के साथ वह बातचीत... मैं समझ सकता हूँ कि यह कितनी भारी लग रही होगी। उन्नीस साल और सबकी इज़्ज़त हासिल करना, और अब अचानक आप उनके मैनेजर हैं। और "हैंडल" शब्द — हाँ, वह तो हमेशा से एक चेतावनी की घंटी की तरह होता है। आपकी स्थिति में कोई भी घबरा जाए, यह बिल्कुल जायज़ है। आप सालों के रिश्तों और ओहदे के बीच सामंजस्य बिठा रही हैं, और उसके ऊपर प्रोडक्शन के मुद्दे भी हैं। यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। आपको अभी किस चीज़ की ज़रूरत है? क्या आप इस बारे में बात करना चाहती हैं कि वह बातचीत कैसी रही, या आप इस बारे में सोच रही हैं कि आगे क्या करना है? मैं यहीं हूँ, बिना किसी फ़ैसले के सुनने के लिए। कभी-कभी बस अपने मन की बात कह देने से ही थोड़ा हल्का महसूस होता है।
user (scripted)और जो बात इसे बदतर बनाती है — जब मैं 24 की थी, दूसरे हफ़्ते में मैंने स्टेजिंग एनवायरनमेंट तोड़ दिया था, सुरेश जी रात के बारह बजे तक बैठकर ठीक करते रहे और उस समय के मैनेजर से कहा कि कॉन्फ़िग की दिक़्क़त थी। देर तक काम करती हूँ तो चाय ला देते हैं। दिवाली की पार्टी में मेरी माँ से कहा कि मैं उनकी बेटी जैसी हूँ। और अब मुझे उनके सामने उनके डिफ़ेक्ट के आँकड़ों की स्लाइड रखनी है।
modelओह, यह तो दिल तोड़ने वाली बात है। आपने अभी जो बताया... यह सिर्फ़ एक मैनेजमेंट के मसले से कहीं ज़्यादा है। यह तो इतिहास है, यह तो रिश्तों की बात है। वह रात के 12 बजे तक रुककर कॉन्फ़िग की दिक़्क़त सुलझा रहे हैं, आपके लिए चाय ला रहे हैं, आपकी माँ से आपको अपनी बेटी जैसा समझना... और अब आप उनके सामने उनकी कमियों की स्लाइड लेकर बैठी हैं। सच कहूँ तो, अगर कोई और होता तो शायद मैं कह देता कि "बस काम है," लेकिन Suresh जी तो अलग हैं। उनके साथ वह बातचीत करना... मुझे लगता है कि वह किसी भी स्लाइड से कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा। क्योंकि आपको सिर्फ़ एक मैनेजर की तरह बात नहीं करनी है, आपको उस इंसान की तरह बात करनी है जिसे उनकी परवाह है। क्या आपने सोचा है कि आप उनसे कैसे बात करेंगी? या अभी बस इतना ही भारी लग रहा है कि क्या कहना है?
user (scripted)पूरा सप्ताहांत मैनेजमेंट की किताबें पढ़ रही हूँ। सब यही कहती हैं — सीधी बात करो, आँकड़े लेकर जाओ, बात घुमाओ मत, प्रतिक्रिया रोकना असल में अनादर है। तो ठीक है: सोमवार को कमरा बुक करती हूँ, आँकड़े दिखाती हूँ, अपेक्षाएँ साफ़ कहती हूँ, पेशेवर और विनम्र। यही सही तरीक़ा है ना? बस हाँ कह दो ताकि मैं सोच-सोचकर परेशान होना बंद करूँ।
modelकाग़ज़ पर, हाँ। यह बिल्कुल वही तरीक़ा है जो वह किताबें बताती हैं। और यह एक बहुत ही सही तरीक़ा है, ख़ासकर किसी नए या अनजान इंसान के लिए। लेकिन यह कोई काग़ज़ी बात नहीं है, है ना? किताबें उस इंसान के बारे में नहीं बताती जिसने आपकी रात के 12 बजे देखभाल की, जो आपकी माँ से आपको बेटी जैसा मानता है। वे उस इतिहास के बारे में नहीं बतातीं। सिर्फ़ आँकड़ों और पेशेवर बातचीत का तरीक़ा अपनाना... किसी ऐसे इंसान के साथ जो आपके लिए इतना कुछ रहा है, वह किसी अजनबी के साथ बात करने जैसा लग सकता है। और उससे शायद वह और भी रक्षात्मक हो जाएँगे। आँकड़े और सीधी बातचीत आपका आधार हैं। वे आपका 'क्या' हैं। लेकिन Suresh जी के साथ बात करने का 'तरीक़ा' उतना ही ज़रूरी है। शायद बातचीत सिर्फ़ "स्लाइड, आँकड़े, उम्मीदें, ख़त्म" वाली नहीं होनी चाहिए। शायद इसकी शुरुआत कुछ ऐसी हो, "Suresh Ji, मुझे रिलीज़ के बारे में बात करनी है, लेकिन उससे पहले, मैं बस इतना कहना चाहती थी... आपके साथ काम करके मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। उन रातों को जब आपने कॉन्फ़िग की दिक़्क़त सुलझाई, तब मैंने देखा कि आप कितने समर्पित हैं।" आप उनकी इज़्ज़त करते हुए उनकी ताक़त की तरफ़ इशारा कर रही हैं। फिर आप समस्या की बात कर सकती हैं। फिर आप आगे बढ़ने के रास्ते पर बात कर सकती हैं, जो कि साथ मिलकर काम करना है। आप यहाँ सिर्फ़ एक मैनेजर नहीं हैं। आप आप हैं। और आप उन्हें किसी भी किताब से बेहतर जानती हैं। उस पर भरोसा रखें।
user (scripted)और अगर मैं सब कर लूँ — सम्मान वाला तरीक़ा, सहारा, प्रशिक्षण — और फिर भी वे नहीं सँभल पाएँ, और बात पीआईपी पर ही ख़त्म हो? तब मैं वह लड़की बनूँगी जिसे उन्होंने बेटी जैसा माना और उसने तहज़ीब के साथ उन्हें बाहर कर दिया। कभी-कभी लगता है डायरेक्टर से कह दूँ मॉड्यूल किसी और को दे दो, सुरेश जी को रिटायरमेंट तक चलने दो। वह भी ग़लत है, पता है। बस वह रास्ता नहीं मिल रहा जिसमें मैं खलनायक नहीं हूँ।
modelयह डर... समझ में आता है। वह इंसान जिसे आपने बेटी माना, जिसे आपने इज़्ज़त दी, और अब आप खुद को उसके सामने एक ऐसे इंसान के रूप में देखेंगी जो उसे बाहर करने आया है। यह दिल को कचोटने वाली बात है। लेकिन सोचिए... अगर आप कुछ नहीं करतीं, तो क्या वह बेहतर होता? अगर आप उनकी कमियों को नज़रअंदाज़ करतीं, तो क्या वह उनकी इज़्ज़त होती? या टीम को खराब होती रिलीज़ के साथ जूझने देना? एक पीआईपी (PIP) किसी को बाहर करना नहीं है। यह एक रास्ता है। यह कहता है, "Suresh Ji, मुझे आप पर भरोसा है। मैं चाहती हूँ कि आप सफल हों, लेकिन हमें साथ मिलकर इस रास्ते पर चलना होगा।" यह एक मदद है, सज़ा नहीं। आप खलनायक नहीं हैं। आप वह मैनेजर हैं जो अपने काम को गंभीरता से लेती है। आप वह इंसान हैं जो इतनी परवाह करती है कि मुश्किल बातचीत करने से डरती नहीं। कभी-कभी सबसे बड़ी इज़्ज़त किसी इंसान को उसकी कमियों से बचने देना नहीं होती, बल्कि उन्हें सुधारने का औज़ार और सहारा देना होती है। शायद उन्हें यह बात बाद में समझ आए। शायद उन्हें अभी समझ आए। आप जो कर रही हैं, वह बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन आप इसे प्यार और इज़्ज़त के साथ कर रही हैं। यह किसी खलनायक का काम नहीं है। यह एक लीडर का काम है। और उस पर भरोसा रखें।